Monday, 31 July 2017

55. शातिर हसीना- फखरे आलम खान

डाॅ. फखरे आलम खान पेशे से वकील है। शौकिया लेखन भी कर लेते हैं। इनके कई कहानी संग्रह, उपन्यास व अन्य दूसरी विधाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित हैं।
  डाॅ. फखरे आलम खान( एडवोकेट) द्वारा प्रेषित उपन्यास  शातिर हसीना पढने को मिला।
क्या कोई उपन्यास ऐसा भी हो सकता है, इस उपन्यास को पढकर एक बात पता चली की प्रकाशन कुछ भी छाप देता है, बस जेब में पैसा होना चाहिए।

कहानी-
उपन्यास की कहानी एक ऐसी औरत की है जिसका पुत्र जेल में एक झूठे अपराध के मामले में बंद है। और वह औरत अपने दुश्मनों बदला चाहती है। अपने घर को छोङ कर अपने आशिक के साथ निकल जाती है। अपने असीम सौन्दर्य के दम पर वह शातिर हसीना नये नये प्रेमी बदलती रहती है और एक बङी अपराधी बन जाती है।
अंत में हद से ज्यादा नाटकीय मोङ आते हैं और शातिर हसीना अपने पुत्र से मिलना चाहती है।
उपन्यास का अंत दुखांत है।
कमियाँ-
- उपन्यास का लेखन तरीका किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं लगता। उपन्यास में पात्र बस राम-राम (अभिवादन) ही बोलते हैं बाकी सब लेखक ही बोलता है।
- एक बात मेरी समझ में नहीं आयी। शातिर हसीना जब पहली बार लेखक से मिलती है तब अभिवादन के पश्चात लेखक कहता है आपके शब्दों में दर्द छुपा है आपके जीवन में दर्द ही दर्द है।
भाई एक अभिवादन मात्र से इतना कुछ कैसे पता चल गया।
- शातिर हसीना एक लेखक को अपनी आत्मकथा सुनाती है और उपन्यास के अंत में वह मारी जाती है। क्या कोई मरा हुआ आदमी अपनी आत्मकथा सुना सकता है।
- छोटी- छोटी गलतियों को छोङ दे तो बङी-बङी गलतियों की भी उपन्यास में भरमार है।
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उपन्यास- शातिर हसीना
लेखक- फखरे आलम‌खान
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ-
मूल्य- 40₹

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