Monday, 31 July 2017

56. तङपन- फखरे आमल खान

फखरे आलम खान का प्रथम कहानी संग्रह है- तङपन।

55. शातिर हसीना- फखरे आलम खान

डाॅ. फखरे आलम खान पेशे से वकील है। शौकिया लेखन भी कर लेते हैं। इनके कई कहानी संग्रह, उपन्यास व अन्य दूसरी विधाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित हैं।
  डाॅ. फखरे आलम खान( एडवोकेट) द्वारा प्रेषित उपन्यास  शातिर हसीना पढने को मिला।
क्या कोई उपन्यास ऐसा भी हो सकता है, इस उपन्यास को पढकर एक बात पता चली की प्रकाशन कुछ भी छाप देता है, बस जेब में पैसा होना चाहिए।

कहानी-
उपन्यास की कहानी एक ऐसी औरत की है जिसका पुत्र जेल में एक झूठे अपराध के मामले में बंद है। और वह औरत अपने दुश्मनों बदला चाहती है। अपने घर को छोङ कर अपने आशिक के साथ निकल जाती है। अपने असीम सौन्दर्य के दम पर वह शातिर हसीना नये नये प्रेमी बदलती रहती है और एक बङी अपराधी बन जाती है।
अंत में हद से ज्यादा नाटकीय मोङ आते हैं और शातिर हसीना अपने पुत्र से मिलना चाहती है।
उपन्यास का अंत दुखांत है।
कमियाँ-
- उपन्यास का लेखन तरीका किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं लगता। उपन्यास में पात्र बस राम-राम (अभिवादन) ही बोलते हैं बाकी सब लेखक ही बोलता है।
- एक बात मेरी समझ में नहीं आयी। शातिर हसीना जब पहली बार लेखक से मिलती है तब अभिवादन के पश्चात लेखक कहता है आपके शब्दों में दर्द छुपा है आपके जीवन में दर्द ही दर्द है।
भाई एक अभिवादन मात्र से इतना कुछ कैसे पता चल गया।
- शातिर हसीना एक लेखक को अपनी आत्मकथा सुनाती है और उपन्यास के अंत में वह मारी जाती है। क्या कोई मरा हुआ आदमी अपनी आत्मकथा सुना सकता है।
- छोटी- छोटी गलतियों को छोङ दे तो बङी-बङी गलतियों की भी उपन्यास में भरमार है।
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उपन्यास- शातिर हसीना
लेखक- फखरे आलम‌खान
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ-
मूल्य- 40₹

54. फांसी मांगे बेटा कानून का- अशोक कुमार शर्मा

राजस्थान के सीकर जिले के एक गांव रूपगढ के लेखक हैं अशोक कुमार शर्मा। अशोक कुमार शर्मा उस दौर के लेखक हैं जब उपन्यास जगत के अच्छे दिन थे।

      प्रस्तुत उपन्यास 'फांसी मांगे बेटा कानून का' अशोक शर्मा जी की जगतार सिंह जग्गा सीरिज की श्रृंखला का एक उपन्यास है, और कहानी भी उसी क्रम में आगे बढती है।
' छत्तीस करोङ का हार', ' मैं बेटा बंदूक का', और प्रस्तुत उपन्यास ' फांसी मांगे बेटा बंदूक का' और इसके बाद इसी क्रम का आगामी उपन्यास था ' कानून वाल' और उससे भी आगे यह उपन्यास अगर जाता है तो मुझे जानकारी नहीं।

"मैं कोई पीर पैंगबर, औलिया फरिश्ता तो हूँ नहीं, जिनके लिए कोई भी इंसान अपनी जान देने में गर्व महसूस  कर सके। मैं तो तेरी तरह एक साधारण इंसान हूँ। खुदा का एक गुनहगार बंदा, जो अपने गुनाह बख्शवाने के लिए दर दर की ठोकरें खाता फिर रहा है।  चढ जाने दे मितरा इस गुनहगार को फांसी पर, ताकि इस गुनहगार को वाहेगुरु सच्चे पातशाह के पास जाकर चिर शांति मिल सके"- जगतार सिंह जग्गा।
कहानी-
       जगतार सिंह जग्गा एक एक प्रसिद्ध वकील है और वह अखबार में न्याय की दुकान नाम से विज्ञापन भी देता है।
माधुरी सिंह एक प्रसिद्ध माॅडल गर्ल है और वह अपनी शादी का विज्ञापन देती है की जो उसे डाॅन भानुप्रताप सिंह की मिल्कियत में से छत्तीस करोङ का हार चुराकर पहनायेगा वह उसी से शादी करेगी।
इसी क्रम में जगतार सिंह जग्गा माधुरी के संपर्क में आता है और वह माधुरी के प्यार में अति सुरक्षित हार की चोरी कर लेता है।
  यहीं से जगतार सिंह जग्गा और डाॅन में दुश्मनी पैदा होती है। जग्गा के हाथों डाॅन मारा जाता है।
  डाॅन के चार सेनापति हरनाम सिंह, गोम्स गौंजाल्विज, बाबू खां सलमानी और जीवन लाल मारवाङी मंत्रणा कर डाॅन के वजीर बाजीराव भौंसले को नया डाॅन बनाते हैं।
नया डाॅन जगतार सिंह जग्गा से दुश्मनी का बदला लेने के लिए माधुरी का अपहरण कर उससे सामूहिक बलात्कार करता है।
तब जगतार सिंह जग्गा अपने महदर्द मित्रों की मदद से डाॅन के साम्राज्य को खत्म करने का निर्णय ले लेता है, और एक एक कर डाॅन के सेनापति मारे जाते हैं।
(उपर्युक्त कहानी छतीस करोङ का हार और मैं बेटा बंदूक की है)
प्रस्तुत उपन्यास 'फांसी मांगे बेटा बंदूक का' में जग्गा और डाॅन की जंग अनवरत जारी है और जग्गा डाॅन के दो और सेनापति बाबू खां सलमानी व गोम्स गौंजाल्विज को मार देता है।
  जगतार सिंह जग्गा का एक साथी प्यारा सिंह जीवन लाल मारवाडी को मारने के चक्कर में स्वयं फंस जाता है।
पुलिस प्यारा सिंह को ही जगतार सिंह जग्गा बनाकर अदालत में पेश कर देती है और प्यारा सिंह भी स्वयं को जग्गा साबित कर देता है।
जब जग्गा को इस हकीकत का पता चलता है वह स्वीकार अदालत में पेश होता है।
आगे क्या हुआ- यह जानने के लिए अशोक कुमार शर्मा का उपन्यास ' कानून वाला' पढना होगा।
     प्रस्तुत उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक के प्रसिद्ध पात्र विमल की नकल पर तैयार किया गया है। उसी प्रकार उपन्यास के कवर पेज पर जगतार सिंह जग्गा उर्फ रमेश चोपङा उर्फ करतार सिंह ग्रेवाल नाम लिखें हैं।
प्रस्तुत उपन्यास में नायक से ज्यादा अन्य पात्रों की अनावश्यक वार्ता हावी रहती है।
एक थ्रिलर उपन्यास में जो पाठक की मांग होती है वैसा उपन्यास में कुछ भी नहीं है। पाठक बङी मुश्किल से उपन्यास को पूरा पढ पायेगा।
इसी उपन्यास में अगर लेखक अपनी मौलिकता का परिचय देता तो ज्यादा अच्छा होता।

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उपन्यास- फांसी मांगे बेटा बंदूक का
लेखक- अशोक कुमार शर्मा
प्रकाशन- राधा पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 222
मूल्य-_20₹
संपर्क-
अशोक कुमार शर्मा पुत्र मदन लाल शर्मा
मु.पो.- रूपगढ
वाया- कौछोर
जिला- श्री गंगानगर
राजस्थान- 332406

Sunday, 30 July 2017

53. पैगाम- सरला रानू


पैगाम- एक प्रेम कथा।
लोकप्रिय सामाजिक उपन्यासकार रानू की धर्मपत्नी सरला रानू द्वारा लिखा गया उपन्यास पैगाम पढने को मिला।
सरला रानू द्वारा लिखा गया यह उपन्यास एक प्रेम कथा है।
पैगाम ऐसे प्यार भरे दिलों की आंसू भरी कहानी, जो जिंदगी की शाम होने तक मिलने के लिए तङपते रहे, लेकिन जिनके साथ जिंदगी ने कभी वफा नहीं की।
कहानी-
         उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह एक अमीर बाप की बेटी और उसी बाप के यहाँ मूर्ति निर्माण वाले एक गरीब युवक की प्रेम कथा है।
दोनों का प्यार अमीर बाप की जिद्द के आगे पूर्ण नहीं हो पाता।
कहानी में प्रेमकथा के साथ-साथ हल्की सी प्राचीन मूर्ति तस्करी की भी कहानी चलती है और यह कहानी उपन्यास के मध्यांतर पश्चात कहानी को संभालने में सक्षम भी है।
कहानी का समापन दुखांत है, जो सहृदय पाठक को भावुक कर देता है।
उपन्यास के पात्र -
            उपन्यास में जो भी पात्र हैं सब कहानी के अनुरूप हैं, सभी पात्रों ने अपनी-अपनी भूमिका में छाप छोङी है।
उपन्यास का एक मात्र पात्र मनोरमा ही ऐसा है जो अगर उपन्यास में न भी होता तो भी उपन्यास चल सकता था।
नायक- राजीव, नायिका- कामना, राजीव की माँ, कामना का पिता सेठ नारायण दास, सेन, बी.के., कुंदन, जाॅनी, मनोरमा, उमेश, सीमा, नौकर और पुलिसकर्मी ।

संवाद-
             प्रेमपूरक उपन्यासों की एक विशेषता उनके संवाद भी होते हैं और जिस विषय में पैगाम उपन्यास खरा उतरता है।
"कहते हैं कि प्यार करने वालों के लिए प्यार एक ऐसा खेल होता है, जिसे वे दिल बहलाने के लिए खेलते हैं।"- (पृष्ठ-75)
"प्यार एक कल्पना होती है और शादी एक हकीकत।"- (पृष्ठ-120)
"प्यार का दूसरा नाम पागलपन ही तो है।"-(पृष्ठ-135)
"जिस दिल पर प्यार का रंग चढ जाये - उस पर दूसरा रंग नहीं चढ सकता।"-(पृष्ठ-136)

उपन्यास में कमी-
           उपन्यास मध्यांतर भाग से पूर्व बहुत ही धीमी गति से चलता है, जिसके कारण रोचकता खत्म हो जाती है।
- पृष्ठ 92 पर नायक राजीव की माँ राजीव से उसकी शादी की बात करती है -" कहीं ऐसा तो नहीं कि तूने किसी लङकी को पसंद कर रखा हो?"(पृष्ठ-92)
जबकि राजीव अपनी माँ से पहले ही कह चुका था की वह शादी करेगा तो कामना से अन्यथा शादी नहीं करेगा।

कुछ शायराना अंदाज-
  ऐसी शायरी का उपन्यास में अलग ही अंदाज है।
'एक हूक सी दिल में उठती है।
एक दर्द सा दिल में होता है।।
सारी रात हम करवटे बदलते हैं।
जब सारा जहां सोता है।।-(पृष्ठ-67)

     उपन्यास के अंत में मात्र सार रूप में कहना जो स्वयं उपन्यास की पंक्तियाँ हैं और उपन्यास की समूची कथा को समेटे हुए हैं।

"दोष प्यार करने वालों का नहीं होता- क्योंकि प्यार जैसी पवित्र भावना को जन्म उसी भी उसी भगवान ने दिया है, जिसने ये संसार रचा है।  दोष होता है उन लोगों का, जो सच्चे प्यार को नहीं पहचानते।........ मगर सच्चे प्रेमी ....दुनिया की रस्मों को छोङकर एक-दूसरे को पाकर ही रहते हैं- भले ही इसके लिए उन्हें अपने जीवन की आहुति क्यों न देनी पङे।" (पृष्ठ-255)
   सरला रानू द्वारा लिखा गया सामाजिक उपन्यास पैगाम 12 खण्डों में विभक्त और 255 पृष्ठ में फैला है।
सामाजिक उपन्यास पढने वाले पाठकों को यह उपन्यास निराश नहीं करेगा।
हालांकि उपन्यास की कहानी विशेष नहीं है पर प्रस्तुतीकरण अच्छा है। उपन्यास मध्यांतर के पश्चात काफी तेज गति से चलता है और पाठक को बांधे भी रखता है।
  उपन्यास के मुख्य आवरण पृष्ठ पर सरला रानू नाम न देकर मात्र रानू नाम दिया है, जिससे लगता है की रानू के नाम को भूनाने की कोशिश की गयी है। हालांकि सरला रानू जी उपन्यासकार रानू की ही धर्मपत्नी है।
  सामाजिक उपन्यास पढने वाले उपन्यास को पढ सकते हैं, उन्हें यह उपन्यास निराश नहीं करेगा।

संपर्क
- सरला रानू
C-56, तृतीय फ्लोर
वेस्ट पटेल नगर
नई दिल्ली-8
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उपन्यास- पैगाम
लेखिका- सरला रानू
प्रकाशन- मनोज पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 255
मूल्य- 25₹

52. मुहँ बोला पति- टाइगर

मुँह बोला पति- अजीब शीर्षक वाला गजब उपन्यास
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आपने मुँह बोला भाई या मुँह बोली बहन तो सुनी होगी, क्या आपने कभी मुँह बोला पति सुना है। जी, हाँ, मुँह बोला पति। एक शादीशुदा औरत का दावा है की उसका मुँह बोला एक पति भी है।
अब पाठक को कुतूहल होगा की ये मुँह बोला पति कैसे हो गया। तो इसके लिए तो राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली से प्रकाशित टाइगर का उपन्यास "मुँह बोला पति" पढना होगा।
  उपन्यास का नाम जितना रोचक है स्वयं उपन्यास भी उतना ही रोचक है। पाठक एक बार पढना शुरु करेगा तो अंत तक सतत पढता ही चला जायेगा।
आप स्वयं उपन्यास की झलक देख लीजिएगा।
"देखो!"- अनिता अपने पति के सामने हाथ जोङकर गिङगिङाने लगी -" मैंने आज तक कभी तुमसे कुछ नहीं मांगा। पहली बार मांग रही हूँ । मुझे संयम ला दो।"
"खबरदार!"- संतोख सिंह दहाङा -" जो तुमने मेरे सामने किसी गैरमर्द का नाम लिया- जूबान खींच लूंगा।"
"संयम कोई गैर नहीं है। वह मेरा मुहँ बोला पति है। मैं उसे बहुत चाहती हूँ । मैं उसके बिना जिंदा नहीं रह सकती।"
कौन था वह अजनबी?
जिसे देखते ही एक पतिव्रता स्त्री सरेआम चीख-चीखकर उसे अपना पति कहने लगी।
शुरु से अंत तक, संस्पेंश से लबरेज एक ऐसी पतिव्रता स्त्री की कहानी,जिसने अपने मुँह बोले पति को बचाने के लिए अपने सगे पति का कत्ल कर डाला।
       वह कोई सम्मोहनकर्त्ता- कोई तांत्रिक या कोई जादूगर था? या फिर कोई जालसाज!
इन उलझने भरे प्रश्नों के उत्तर तो टाइगर द्वारा लिखित इस मर्डर मिस्ट्री में ही मिल सकते हैं।
विशेष- टाइगर (JK VERMA) ने एक बार फेसबुक पर बताया था की यह उपन्यास उन्होंने पंजाब के भटिण्डा शहर के एक कस्बे भुचो मण्डी में रहकर लिखा है जहाँ की ये कहानी है।
लेखक महोदय का दावा है इस उपन्यास के दो पात्र मिथिलेश बाबू और लेडिज टेलर रंगीला दोनों वास्तविक पात्र है।
कहानी-
उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है। बैंक कर्मचारी मिथिलेश बाबू अपने भानजे मनोचिकित्सक संयम अरोङा को एक विशेष काम के लिए भुच्चो मण्डी (पंजाब) बुलाते हैं।
भटिण्डा शहर में संयम को एक लङकी सुरभि मिलती है जो स्वयं को भुच्चो मण्डी की निवासी बताती है और संयम के साथ ही सफर करती है।
  भुच्चो मण्डी पहुंचने के अगले दिन उस लङकी सुरभि की हत्या हो जाती है और उसका कातिल संयम अरोङा को ठहराया जाता है।
  कस्बे के विधायक त्रिलोचन सिंह की पौत्रवधू अनिता जब संयम को देखती है तो वह उसे अपना मुँह बोला पति मानने लगती है और चिल्लाने लगती।
जब अनिता का पति इसका विरोध करता है तो अनिता अपने पति का कत्ल कर देती है।
इस प्रकार कत्ल दर कत्ल होते हैं और कहानी उलझती चली जाती है।
- सुरभि कौन थी?, उसका कातिल कौन था?
- अनिता संयम को अपना मुँह बोला पति क्यों कहती है?
- अनिता अपने पति का कत्ल क्यों करती है?
- मिथिलेश बाबू संयम को अपने  शहर क्यों बुलाते हैं?
- असली कातिल कौन है?
- क्या रहस्य है मुँह बोले पति का?
ऐसे असंख्य प्रश्नों के उत्तर तो टाइगर के मर्डर मिस्ट्री उपन्यास 'मुँह बोला पति' को पढकर ही मिलेंगे।

कमियां-
उपन्यास में लेखक ने एक जाति/समुदाय विशेष पर बार-बार गलत टिप्पणी की है।
इस विषय पर जुलाई 2017 को फेसबुक के दीवाने नामक ग्रुप पर बहस भी चली जिसमें लेखक महोदय ने भविष्य में ऐसी गलती न होने का वादा किया।
- लेखक का दावा है यह एक उपन्यास पंजाब के भुच्चो मण्डी कस्बे में रहकर लिखा है लेकिन उपन्यास में पंजाब के भुच्चो मण्डी के नाम का वर्णन मात्र है, वहाँ के परिवेश और स्थानों का कहीं कोई जिक्र नहीं। अगर वहाँ के स्थानों आदि का वर्णन होता तो उपन्यास की विश्वसनीयता बढ जाती।
  उपन्यास रोचक है, पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।
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उपन्यास - मुँह बोला पति
लेखक- टाइगर (JK VERMA, हरियाणा)
प्रकाशन- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 271
मूल्य-20₹

Saturday, 22 July 2017

51. किसका कत्ल करुं- टाइगर

क्या आप में एक जासूसी दिमाग है?
अगर हां! तो प्लीज बताइए...
मेरे परिवार का कातिल मेरा कौन सा ब्वाॅयफ्रेण्ड है? और कैसे है?
यह चैलेंज है टाइगर द्वारा लिखित उपन्यास 'किसका कत्ल करुं' में।
प्रस्तुत उपन्यास एक दिमागी जंग है।
लेखक का दावा है कि इस जंग को सिर्फ वही पाठक जीत सकता है, जिसके दिमाग के दरवाजे और खिङकियां खुली हुयी हैं।
  दावे में कितनी सच्चाई है- यह जानने के लिए पढिए प्रस्तुत उपन्यास और ईनामी प्रतियोगिता में शामिल होकर जीतिए 5100/- के आकर्षक पुरस्कार।
(उपन्यास के अंदर के शीर्षक पृष्ठ से)
यह उपन्यास स्वयं में एक पहेली होने के साथ-साथ एक नया प्रयोग भी है।
पहेली तो इस दृष्टि से है की पाठक को उपन्यास की नायिका सोनाली महाजन के परिवार के हत्यारे को पकङना है। पाठक के समक्ष चार पात्र हैं और उन्हीं चारों में से एक कातिल भी है।
प्रयोग इस दृष्टि से है की उपन्यास का कोई अन्य भाग नहीं है, उपन्यास स्वयं में पूर्ण है, लेकिन पाठक के समक्ष एक प्रश्न छोङकर चला जाता है  और वह प्रश्न है की सोनाली महाजन के परिवार का कातिल कौन है?
कहानी-
       उपन्यास की कहानी सोनाली महाजन को मिले उस पत्र से होती है जिसमें यह वर्णन होता है की उसका पङोसी अनिल वर्मा उसके परिवार को मौत के घाट उतार देगा।
  सोनाली इस पत्र को लेकर सब-इंस्पेक्टर सुधीर गुप्ता से मिलती है और क्रिमिनल वकील रंजीत चौहान से भी संपर्क करती है।
मुकेश चांदना, जो की सोनाली के बचपन का मित्र है और एक और पात्र है नरेश मेहता जो की एक विशेष घटना के दौरान सोनाली से मिलता है।
सोनाली के जन्मदिन की एक छोटी सी पार्टी में सुधीर गुप्ता, नरेश मेहता, मुकेश चांदना, रंजीत चौहान और रंजीत की बहन प्रिया शामिल होते हैं।
इस पार्टी के दौरान सोनाली की बहन पर जानलेवा हमला होता है और सोनाली के पापा प्रमोद महाजन के टांग में कोई अज्ञात शख्स गोली मार देता है।
यहीं से सोनाली के परिवार पर मुसीबतों के पहाङ टूट पङते हैं और एक दिन सोनाली के मम्मी-पापा व बहन की हत्या हो जाती है।
हत्यारा कौन है यह प्रश्न अंत तक यथावत बना रहता है।
पात्र- उपन्यास में पात्रों की संख्या बहुत है लेकिन कोई भी पात्र ऐसा नहीं है जो कहानी के अनुकूल न हो।
सभी पात्र यथासंभव अपने किरदार को अच्छी तरह से निभाते हैं।
मुख्य पात्रों के अतिरिक्त अन्य पात्र हैं- चांदराम, कब्बाङी, रिश्तेदार, सुनंदा, ख्याली राम,बाॅस, मनीषा इत्यादि ।
कब्बाङी और रिश्तेदार -
उपन्यास के यह दो ऐसे पात्र हैं जो स्वयं में एक अजूबा होते हुए भी महत्वपूर्ण हैं‌। कहानी का अधिकांश भाग इन्हीं दो पात्रों पर टिका है‌।
दोनों पात्र रहस्यमय होते हुए भी पाठक को हँसाने में सक्षम है।
उपन्यास में कमी-
उपन्यास में कत्ल पर कत्ल होते हैं और अंत तक कातिल का पता नहीं चलता, भविष्य में किस उपन्यास में यह रहस्य खोला गया है इसका कहीं भी वर्णन नहीं ।
- सोनाली महाजन को जो व्यक्ति सर्वप्रथम एक पत्र लाकर देता है, अगर सोनाली उससे यह पूछ लेती की तुम्हें कैसे पता चला की मैं सोनाली महाजन हूँ, यह मेरा घर है, तो कहानी बहुत हद तक बदल जाती।
- इसके अलावा और भी बहुत सी उपन्यास में कमियां है पर वो कातिल पकङे जाने तक न बताने योग्य हैं।
उपन्यास पढें-
उपन्यास बहुत ही रोचक है, उक्त कमियों को नजरंदाज करके पढें तो मुझे विश्वास है ये उपन्यास पाठक को लंबे समय तक याद रहेगा।
जब भी टाइगर या इस उपन्यास का नाम आयेगा तब भी कातिल को तलाशता रहेगा, वर्षां बाद भी।
क्योंकि यह एक
अनसुलझी मर्डर मिस्ट्री है।

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  उपन्यास- किसका कत्ल करुं
लेखक- टाइगर (JK Verma)
प्रकाशन- राजा पाकेट बुक्स, दिल्ली
पृष्ठ-272
मूल्य-20₹

Tuesday, 11 July 2017

50. कानून का शिकंजा- अनिल मोहन

मैंने अनिल मोहन के उपन्यास ज्यादा नहीं पढे और उपन्यास पर लिखने के मामले में यह अनिल मोहन का पहला उपन्यास है।
माउंट आबू(सिरोही, राजस्थान) में अध्यापक की नौकरी में आये मुझे अभी एक सप्ताह ही हुआ है और इस दौरान मात्र दो उपन्यास पढे हैं। एक अनुराग कुमार जीनियस का 'एक लाश का चक्कर' और दूसरा अनिल मोहन का ' कानून का शिकंजा' दोनों उपन्यास ही अपनी क्षमता पर खरे नहीं उतरे।
  प्रस्तुत उपन्यास कानून का शिकंजा पाठक को अक्षय कुमार की फिल्म ' राऊडी राडौर' की कुछ-कुछ झलक दिखलायेगा।(मेरे विचार से यह उपन्यास फिल्म से पहले का है)
  कहानी- उपन्यास की कहानी सुनीता नामक युवती के दुष्कर्म से आरम्भ होती है। इस युवती से दुष्कर्म बलाकी राम नामक एक खलनायक करता है और उसी दौरान वहाँ पर अमित नामक युवक पहुंचता है, लेकिन वह भी उस युवती को बचा नहीं पाता और स्वयं बलाकी राम के हाथ से पिट जाता है।
जब वह युवती पुलिस स्टेशन अपनी रिपोर्ट दर्ज करवाने जाती है तो वहाँ उसका सामना बहादुर पुलिस इंस्पेक्टर रंजीत चौपङा से होता है।
वह सुनीता नामक युवती से इंसाफ का वादा कर बलाकी राम को गिरफ्तार कर लेता है लेकिन कुछ भ्रष्ट अफसरशाही और नौकरशाही के चलते बलाकी राम रिहा हो जाता है।
बलाकी राम सुनीता नामक युवती का अपहरण कर उसे नयन साहनी नामक नेता की हवस पूर्ति के लिए भेज देता है।
  दूसरी तरफ इंस्पेक्टर रंजीत इस बात से खफा है की बलाकी राम उसके हाथ से निकल गया। तब उसे पता चलता है की बलाकी राम के सिर पर रेड स्पाइडर का हाथ है।
रेड स्पाइडर शहर का सबसे बङा खतरनाक अपराधी है। वह कौन है? कोई नहीं जानता। उसके बारे में जिसने भी जानने की कोशिश की वह मारा गया।
अब इंस्पेक्टर रंजीत रेड स्पाइडर को खोजने निकलता है और वह एक हद तक सफल भी हो जाता है लेकिन उसे रेड स्पाइडर मौत के घाट उतार देता है।
  उपन्यास का एक और महत्वपूर्ण पात्र है- सूरज। इंस्पेक्टर रंजीत का हमशक्ल। (उपन्यास का प्रथन पृष्ठ इसी पात्र से आरम्भ होता है)
एक आवारा किस्म का युवक। रंजीत की हत्या की खबर दबा कर पुलिस कमिश्नर सूरज को इंस्पेक्टर रंजीत चौपङा बना कर मैदान में उतारते हैं और अंत में रेड स्पाइडर को ढूंढकर मौत के घाट उतारते हैं।
कहानी बहुत कुछ हिंदी फिल्म राउडी राठौर से मिलती-जुलती नजर आती है।
उपन्यास के अंत में एक ऐसे व्यक्ति को रेड स्पाइडर दिखा दिया जाता है जिसका पूर्व में उपन्यास में कोई महत्वपूर्ण भाग नहीं है। मात्र पाठक को चौकांने के लिए एक पात्र को रेड स्पाइडर नामक खलनायक बनाकर पेश कर दिया गया।
उपन्यास में बहुत से घटनाक्रम अनावश्यक है-
- अमित और उसके बाप का इस पूरे उपन्यास में कोई विशेष योगदान नहीं है।
- सुनीता नामक युवती जिससे यह कहानी आरम्भ हुयी चंद पृष्ठों के पश्चात उसका कहीं कोई नाम नहीं ।
- कमल साहनी यहाँ प्रारंभ में एक घटिया किस्म का नेता है, वही अंत में रेड स्पाइडर का दुश्मन बन कर अच्छा दिखा दिया गया।
- सूरज का पहली बार पुलिस कमिश्नर से सामना होता है तो वह बेमतलब ही अपना नाम पता कमिश्नर को बता देता है।
अगर सार रूप में देखा जाये तो अनिल मोहन का प्रस्तुत उपन्यास ' कानून का शिकंजा' पाठक का समय खराब करने वाला उपन्यास है। जिसमें बेमतलब की घटनाएं भरी पङी हैं।
उपन्यास के उपर महाविशेषांक लिखा है लेकिन उपन्यास में कुछ विशेष नहीं है।
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उपन्यास- कानून का शिकंजा (थ्रिलर)
लेखक- अनिल मोहन
प्रकाशक- धीरज पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 238
मूल्य- 40%