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Wednesday, 31 May 2017

47. द ओल्ड फोर्ट- एम. इकराम फरीदी

युवा लेखक एम. इकराम. फरीदी का प्रथम उपन्यास 'द ओल्ड फोर्ट- भूतों की एक गाथा' पढने को मिला। जैसा की नाम से ही स्पष्ट होता है इस उपन्यास में कहानी किस प्रकार है, वैसा ही विचार पाठक के मन में उभरता है। वह विचार एक हद तक सही भी है, लेकिन लेखक ने उपन्यास का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार किया है की पाठक एक बार उपन्यास उठाने के बाद अंतिम पृष्ठ पढ कर ही रहेगा।
उपन्यास की कहानी की बात करें तो इसका प्रथम दृश्य ही पाठक को स्वयं में बांधने में सक्षम है।
एक गांव है बहरामपुर, उसी गांव के पास है एक है प्राचीन किला। इस किले के बारे में प्रसिद्ध है की इसमें भूत रहते हैं। इस किले का मालिक चौधरी सुखबीर सिंह इस जमीन को बेचना चाहता है लेकिन भूत किला होने के कारण लोग इसे खरीदते नहीं। जिन-जिन लोगों ने इस जमीन को खरीदने की कोशिश की तो उनको बहुत हानि उठानी पङी।
      डाॅक्टर भगनानी, जो की एक मनोवैज्ञानिक है, वे भूत-प्रेतों पत विश्वास नहीं करते। किले की जमीन का मालिक सुखबीर चौधरी इस जमीन से किले को ढहाने का सौदा एक अरब में डाॅक्टर से सौदा करते है। एक अरब में मात्र एक किला ही ढहाना है, डाॅक्टर भगनानी के कान भी खङे हो जाते हैं और भगनानी का साथी डाॅक्टर के मन में भी कातिलाना हवस जाग जाती है।
तब डाॅक्टर भगनानी व डाॅक्टर गाबा मिलकर अपने छह विद्यार्थियों की एक टीम तैयार करते हैं।
किला भी कोई मामूली नहीं। किलें में नरभक्षी वृक्ष हैं, कच्छप जितने बङे बिच्छू हैं और भेडियों का बसेरा भी है।
किले का एक दृश्य देखिएगा-
इस चीख ने सबके कलेजों को थर्रा दिया।
सबने पूछा, -"क्या हुआ?"
शुभम् की भयग्रस्त दृष्टि जिधर उठी थी, उधर ही उसने इशारा कर किया, -" वो देखो।"
सबने उधर देखा। उन सबके प्राण कांप उठे थे।
यह वही स्थान था जहां बिच्छू को मारा गया था। लोथङों में तब्दील बिच्छू वहीं होना चाहिए था, लेकिन अब नहीं था। वहीं दीवार पर खून से अंग्रेजीकैपिटल वर्ङ में लिखा था।
You are welcome
  - क्या किले में भूत है?
- सुखबीर चौधरी क्यों किले को तोङने के लिए एक अरब रुपये देने को तैयार हो गया?
- डाॅक्टर के लालच का क्या परिणाम निकला?
- किले में प्रवेश करने पर डाॅक्टर की टीम को क्या -क्या परेशानी आयी?
इन सब उलझे सवालों के जवाब तो एम. इकराम फरीदी कर उपन्यास को पढकर ही मिलेंगे।
उपन्यास किसी अंधविश्वास का समर्थन नहीं करता अपितु भूत-प्रेत आदि को स्थापित करने वाले व्यक्तियों का विरोध कर एक अच्छे समाज निर्माण का सपना दिखाता है।
"ये तो और भी हैरानी की बात हो गयी- इन गुरुओं ने भूतों को पैदा कर दिया लेकिन नाश नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा क्यों?" (पृष्ठ-17)
" हमारा टारगेट है कि लोग अंधविश्वास के विरोधी बन जायें। एक से कम इतने जागरुक तो हो जाएं की अंधविश्वास को जानने लग जाए कि अंधविश्वास कहते किसे हैं।" (पृष्ठ-27)
उपन्यास की विशेषता-
पाठक के मन में विचार उठता होगा की हम इस उपन्यास को क्यों पढें तो इसके कई कारण है।
1. उपन्यास अंधविश्वास का खण्डन करता है और एक वैज्ञानिक सोच स्थापना की कोशिश करता है।
2. भूत- प्रेत आदि के विचारों को जङ से खत्म करने में सहायक है।
3. यह उपन्यास विशेष तौर पर किशोरों के लिए अति उपयोगी है, और देखा जाये तो यह एक किशोर श्रेणी का उपन्यास है।
3. उपन्यास मनोविज्ञान को महत्व देता है।
4. मनोरंजन के साथ-साथ मानसिक समझ विकसित करने में सहायक है।
उपन्यास में कमियां-
लेखक जो भी रचना करता है उसमें कोई न कोई कोई रह जाती है। उपन्यास में भी कुछ कमियां है लेकिन वे कथ्य को निष्प्रभावी नहीं बनाती।
1.उपन्यास में शाब्दिक गलतियाँ हैं। यह मुद्रक की गलती है लेखक की नहीं ।
2. उपन्यास में सस्पेंश (रहस्य) है, लेकिन लेखक सस्पेंश को लंबा नहीं खीच पाया। सस्पेंश बनने के साथ-साथ खत्म हो जाता है।
3. डाॅक्टर गाबा का अपनी पुत्री अक्षरा को कत्ल का कहना अजीब सा लगता है। (पृष्ठ-51-55)
4. पृष्ठ संख्या 106-110 पर डाॅक्टर भगनानी का व जासूस सुभाष कौशिक का वार्तालाप कुछ लंबा व विषय से अलग भटक गया लगता है।
यह उपन्यास बहुत ही रोचक, संस्पेंशपूर्व है। जहां उपन्यास में भूत- प्रेत को विषय बनाया गया है वहीं मनोविज्ञान के माध्यम से भूत- प्रेत व अंधविश्वास का खण्डन कर एक वैज्ञानिक समाज निर्माण की इच्छा व्यक्त की गयी है।
लेखक इकराम फरीदी का प्रस्तुत प्रथम उपन्यास बहुत अच्छा है और यह सभी वर्ग के लिए उपयोगी व ज्ञानवर्धक है।

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उपन्यास - द ओल्ड फोर्ट- भूतों की एक गाथा ( हिंदी)
ISBN NO. 81-88388-96-3
लेखक- एम. इकराम फरीदी
प्रकाशन- हिंदी साहित्य सदन- दिल्ली
www.hindisahityasadan.com
मूल्य- 125₹
पृष्ठ- 223

Monday, 15 May 2017

46. घातक गोली- सुरेन्द्र मोहन पाठक

"ये आपका चेक।"- सोनाली ने मुझे चैक थमाया।
" भई वाह!"- तभी दरवाजे पर प्रकट हुआ शरद बोला- "रिश्वत! वो भी सरेआम! या शायद उजरत। खास उन सेवाओं की जो हो चुकी हैं या अभी होनी हैं?"
"मिस्टर कोहली तुम्हारे पापा के बुलाये यहां आए हैं।"
"किसी के भी बुलाए आए हों लेकिन इस वक्त तो यहाँ है। तुम्हारे साथ। मैंने रंग में आकर भंग डाल दिया।"
"निहायत बदतमीज आदमी हो"- एकाएक मैं आवेशपूर्ण स्वर  में  बोला।
" तुझे बोलने को किसने कहा है कुतिया के हिमायती ?"
तत्काल आपके खादिम के खून में मिली 93-आक्टेन भङकी।
मैं मुट्ठियां भींचे उसकी तरफ बढा।
उसने अपना हाथ सीधा किया तो मुझे उसमें रिवॉल्वर सिखाई दी। उसने रिवॉल्वर की नाल मेरी छाती से लगाकर घोङा खींचा।
सोनाली के मुँह से चीख निकली।
    ऐसा ही सिरफिरा नीमपागल, वहशी, ड्रग एडिक्ट युवक था शरद चौहान जो की जायदाद का मालिक बनने वाला था।
   दिनांक .04.2017 को द्वितीय श्रेणी अध्यापक की परीक्षा थी श्री गंगानगर (राजस्थान) में। तब अपने एक मित्र इन्द्राज बरोङ के साथ गया था। अंकित जांगिङ (ऐलनाबाद, सिरसा) हमें विदा करने आया। मैं गुरप्रीत सिंह, इन्द्राज बरोङ, विकास पचार तीनों को। वापसी में रेल्वे स्टेशन के सामने एक किताबों की दुकान दिखाई दी और में बिना बताये, चुपके से दुकान में जा घुसा। मित्र मण्डली जब तक मुझे खोजती तब तक मैं चार उपन्यास खरीद कर उनके पास पहुंच चुका था।
मैंने वहाँ से प्रकाश भारती के स्लीपिंग पिल्स, लास्ट हिट, सुनील प्रभाकर का मौत का साया और सु.मो. पाठक का घातक गोली आदि उपन्यास खरीदे, मात्र सौ रुपये में।
         सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास घातक गोली की समीक्षा प्रस्तुत है।
    महा सिंह ने एक राज घराने की ऐसी महिला से शादी की थी जिसके पहले एक पुत्र था। वह पुत्र था शरद चौहान। महा सिंह की पत्नी मरते वक्त अनिवार्य शर्तों के साथ वसीयत कर गयी। एक शर्त यह भी थी की एक निश्चित उम्र से पहले अगर शरद चौहान शादी करेगा तो वह जायदाद से बेदखल कर दिया जायेगा। शरद चौहान वह निर्धारण उम्र पूरी करने ही वाला था की उससे पहले वह शादी करने को मचल बैठा।
वृद्ध महा सिंह ने अपनी जवान सेक्रेटरी सोनाली से शादी कर ली।
शरद चौहान ड्रग्स के साथ-साथ जुए में भी उधार लेकर  लाखों रुपये हार चुका है। जब गैंगस्टर जान पी. एलैग्जेंडर ने शरद चौहान से रुपये वापसी का दवाब बनाया तो वह स्वयं को असमर्थ बताने लगा।
  महा सिंह ने शरद चौहान को ड्रग्स जैसे नशे से छुटकारा दिलाने के उस यात्रा पर रवाना कर दिया। शरद चौहान के साथ डिटेक्टिव सुधीर कोहली, फैमिली  डाॅक्टर व बख्तावर सिंह व्यक्ति को यात्रा पर साथ भेजा गया।
  यात्रा के दौरान रात के अंधेरे में शरद चौहान गायब हो गया।
सुधीर कोहली जब वापस घर लौटा तब उसे सूचना मिली की एक लङकी की लाश मिली है और पुलिस को सुधीर पर उसकी हत्या का शक है।
लङकी के जिस्म में दो गोलियाँ  है। एक तब गोली मारी गयी जब वह जीवित थी और दूसरी उसके मरने के बाद।
अब पुलिस देख रही है की इनमें से घातक गोली कौनसी थी, जिसने लङकी  जान ले ली।
- शरद चौहान कहां गायब हो गया?
- क्या रहस्य था शरद चौहान के गायब होने में?
- क्या शरद चौहान ने शादी कर ली?
- मरने वाली लङकी कौन थी?
- उसका चौहान परिवार से क्या संबंध था?
सुमोपा द्वारा लिखा गया सुधीर कोहली सीरीज का  एक तेज रफ्तार उपन्यास है।
स्वयं सुधीर कोहली एक ऐसे जाल में फंस जाता है जिसमें वह जाने- अनजाने स्वयं उलझता जाता है।
उपन्यास की भाषा शैली की बात करें तो यह सुमोपा के उन्हीं चिर-परिचित शब्दों का प्रयोग कर लिखी गयी है जैसा की वह वर्षों से लिखते  रहें हैं।
मुझे हैरानी होती है की लेखक अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है लेकिन वह वर्षों से वहीं घीसे-पिटे शब्द काम में ले रहा है।
वाहियात, बाजरिया, अलबता, जैसे शब्द तो सभी पात्र, सभी उपन्यासों में बोलते हैं।
वहीं इनके उपन्यासों में जो भी कत्ल होते हैं वह भी सभी रिवॉल्वर से होते हैं। वह भी 32 या 28 कैलीबर के रिवॉल्वर से। वही स्मिथ एण्ड वैसन कम्पनी का रिवॉल्वर ।
  सुधीर सीरीज की यह मर्डर मिस्ट्री वास्तव में पढने योग्य है।
प्रस्तुत उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक का 203 नंबर पर आता है।
सुधीर कोहली सीरीज का यह 11 वां उपन्यास है।
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उपन्यास- घातक गोली (1997)
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
वर्ग- मर्डर मिस्ट्री
प्रकाशक- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 231
मूल्य- 20₹

- लेखक का पता
सुरेन्द्र मोहन पाठक
Post Box No.-9426
दिल्ली-110051
 

45. मौत आयेगी सात तालों में- विनय प्रभाकर

कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जो एक बार पढते ही वर्षों तक याद रहते हैं। उपन्यास की कहानी, पात्र और संवाद पाठक कभी नहीं भूलता। एक अच्छे लेखक की भी यही पहचान है की वो अपने पाठकों को एक ऐसी कहानी दे जिस के दम पर पाठक उस उपन्यासकार को याद रख सकें।    लेखक की प्रतिभा की पहचान भी तभी होती है जब उसकी रचना को पाठक वर्षों तक याद रखें।
      ऐसे ही एक प्रतिभावान लेखक हैं विनय प्रभाकर। उनका एक उपन्यास है, नाना पाटेकर सीरीज का - मौत आयेगी सात तालों में। एक ऐसा उपन्यास या कहें की एक ऐसा पात्र जो पाठक को भूलाये नहीं भूलता।
     मैंने इस उपन्यास को प्रथम समय सन् 2002 में पढा था और वह मेरे मस्तिष्क में एक याद बन कर रहा। और अब पुन: may 2017 को इस उपन्यास को पढा तब भी वही आनंद आया जो पहली बार पढने में आया था।
उपन्यास का मुख्य पात्र है मेजर नाना पाटेकर। वक्त का मारा एक सेना का मेजर, सेना का वह जांबाज आॅफिसर, जिसे वक्त की गर्दिश ने मुजरिम बना दिया। मेजर चाहे मुजरिम हो पर देश उसके लिए पहले है, वह ऐसा कोई भी काम नहीं करता जिससे देश को क्षति हो। अब तो वह कानून की नजर में एक अपराधी है। एक ऐसा अपराधी जिस पर कई हत्याओं का आरोप है। आतंकवादी, पुलिस और कुछ अन्य लोगों की हत्याओं के आरोप, जिसमें में से कई सच हैं तो कई झूठ।
प्रस्तुत उपन्यास के कथानक की बात करें तो इसकी कहानी प्रतिशोध और डकैती पर आधारित है। क्या नाना पाटेकर जैसा देशभक्त डकैती करेगा।
कहानी-
नाना पाटेकर के वृद्ध चाचा  प्रताप पाटेकर की हत्या उनकी जवान वीबी ऋचा अपने प्रेमी इंस्पेक्टर युसूफ खान के साथ मिलकर कर देती है और इंस्पेक्टर इस हत्या का आरोप मेजर नाना पाटेकर पर लगा देता है। नाना पाटेकर को सजा सुना दी जाती है। प्रतिशोध की आग में जलता मेजर एक दिन जेल से फरार हो जाता है।
     जाॅन, इकबाल, ऊदल और चंदू चारों ब्रिटिश कंसुलेट की इमारत के एक कर्मचारी के नाखून चुराना चाहते हैं। जी हाँ, नाखून, जिनकी कीमत लाखों में।
   दूसरी तरफ है एक चाण्डाल चौकङी। पण्डया, दामू, ढोलिया और धनू। यह चाण्डाल चौकङी छोटी-मोटी लूट कर अपना जीवन यापन करती है।
किस्मत इन सभी को एक साथ मिला देती है। तब प्लान बनता है अमेरिकन सेंटर नामक इमारत में मौजूद उपस्थित दो टन सोने को लूटने का।
  लेकिन इसके लिए पहले कुछ रुपयों की जरूरत थी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए एक टीम बनाकर एक बीयर बार लूटने की कोशिश की जाती है। लेकिन वहाँ से भी जान बचाकर भागना पङता है। वह बीयर बार था एक गुण्डॆ असलम का। अब असलम को तलाश है उन लोगों की जिन्होंने उसके बीयर बार को लूटने की कोशिश की।
     युसूफ खान ब ऋचा को जब नाना पाटेकर के फरार होने की सूचना मिलती है तो वह नाना को मारने की सुपारी गैंगस्टर लक्ष्या भाई को दे देते हैं।
  इन सबसे अंजान नाना पाटेकर अपने लक्ष्य दो टन सोने को लूटने के प्लान पर कार्यरत हैं।
किसी तरहं असलम को भी इस लूट की खबर हो जाती है। वह भी चोर पर चोरी की ताक में बैठा है।
- क्या नाना पाटेकर अपने प्रतिशोध को पूरा कर पाया?
- क्या था लाखों रुपये के नाखूनों का रहस्य?
- नाना पाटेकर दो टन सोना लूट पाया?
-क्या हुआ जब असलम लक्ष्या भाई नाना पाटेकर से टकराये?
- भारत सरकार से चोरी-चोरी दो टन सोना अमेरिकन सेंटर में किसने जमा कर रखा था?
इन सब प्रश्नों के उत्तर तो विनय प्रभाकर द्वारा लिखे गये मौत आयेगी सात तालों में उपन्यास पढकर ही प्राप्त किया जा सकता है।
उपन्यास तेज रफ्तार है, कहीं भी बोरियत या उलझाव नहीं है।
प्रतिशोध और डकैती पर लिखा गया शानदार उपन्यास।
नाना पाटेकर सीरीज का यह अविस्मरणीय कारनामा वास्तव में पढने लायक है।
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उपन्यास- मौत आयेगी सात तालों में।
लेखक- विनय प्रभाकर
प्रकाशक- मनोज पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ-270

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Saturday, 13 May 2017

44. ट्रेजडी गर्ल- एम. इकराम फरीदी


एक लङकी थी जो अंधकार से निकल कर प्रकाश को लालायित थी- एक शुभचिंतक के माध्यम से उसे प्रकाश प्राप्त हुआ मगर अंधकार के अनाकोण्डा को ये गंवारा नहीं था.......
      यौवन, दुर्भाग्य, शोषण और अपराध के गर्भ में परिवेश पाकर परिपक्व हुयी एक लङकी।
        उपर्युक्त पंक्तियां नव लेखक एम. इजराम फरीदी के द्वितीय उपन्यास ट्रेजडी गर्ल के अंतिम कवर पृष्ठ से हैं।
        एक थी गुल- जी हां, ये कहानी एक गुल की है और उस गुल का नाम था -सुरभि। नाम उसका सुरभि था लेकिन अतीत उसका काला था। वही काला अतीत उसका वर्तमान बन कर जब सामने खङा हो गया। तब मुसीबतों के पहाङ उस पर टूट पङे।
  प्रस्तुत उपन्यास जहाँ एक और हमें सामाजिक लगता है वहीं दूसरी तरफ जासूसी भी दिखाई देता है। जहाँ एक तरफ प्यार है तो वहीं दूसरी तरफ इसमें नफरत भी है। दोस्त हैं, दुश्मन भी हैं और दोस्त-दुश्मन भी है।

कहानी-
उपन्यास की कहानी की बात करे तो यह सुरभि नामक एक ऐसी युवती की कहानी है जिसका अतीत कभी दागदार रह चुका है। अब सुरभि एक अच्छा जीवन जी रही है, अपने अतीत को भूला कर। लेकिन एक दिन सुरभि के अतीत का मित्र ही उसके सुनहरे वर्तमान पर काला बादल बन कर छा जाता है। अब सुरभि कहां जाये।
      इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की नियति है की वह हर जगह छली जाती। इन परिस्थितियों से उसे  हर बार बचाता है सुरभि का दोस्त अजय।
अपने अतीत के ब्लैकमेलर से बचने के लिए अपने मित्र अजय का सहारा लेती है। लेकिन ब्लैकमेलर उसके पति विशाल से पास जाने की धमकी देता है।
      लेकिन जब सुरभि के पति विशाल का ब्लैकमेलर से वास्ता पङता है तब वह सुभाष कौशिक नामक जासूस को  सत्यता का पता लगाने के लिए बुलाता है।
सुरभि का दोस्त अजय जब भारी मुसीबत में‌ फंस जाता है तब सुरभि चाह कर भी उसकी मदद नहीं कर पाती और सुरभि का पति विशाल भी इस मित्रता को पसंद नहीं करता।
यहीं से कहानी में एक जबरदस्त मोङ आता है और कहानी अपने-पराये, दोस्त-दुश्मनों के चेहरों से नकाब उतारती हुयी जासूस सुभाष कौशिक के संवाद के साथ एक विषाद पूर्ण स्थिति में खत्म हो जाती है।
पल-पल बदलते पात्र-
कहानी की एक विशेषता यह है की समस्त पात्र स्वतंत्र है और एक अच्छा कहानीकार भी वही माना जाता है जो अपने पात्रों को अपनी कठपुतली न बनाकर उन्हें स्वतंत्र आचरण करने दे। इसी विशेषता के कारण ट्रेजडी गर्ल उपन्यास सत्यता के ज्यादा नजदीक नजर आता है।
     पाठक उपन्यास के किसी भी पात्र पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं कर सकता है की यह पात्र कहां तक ईमानदार है या कहां तक अपने नियमों पर बद्ध।
  कब सुरभी बदल जाती है, कब विशाल पल-पल बदलता है और कब अजय के विचारों में परिवर्तन आ जाये कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
एक जबरदस्त दृश्य-
उपन्यास का एक बहुत ही हास्य व रोचक दृश्य है। जब ब्लैकमेलर सुरभि के पति को सुरभि के काले अतीत के दम पर ब्लैकमेल करने की कोशिश करता है
आप भी देख लीजिएगा।
ब्लैकमेलर ने फोन किया- " आदमी बङे खतरनाक बोल रहे हैं हम...।"
"क...कौन?"
"नाम को जाने दो...।"
"ओह समझा- संदीप दूबे बोल रहे हो तुम।"
ब्लैकमेलर उछला- "अबे..तुझे मेरा नाम कैसे मालूम?"
"...असली संदीप दूबे जी ने....।"
"असली संदीप दूबे ? ये कौन हुआ बे?"
पाठक महोदय वास्तविकता तो ये है की ये ब्लैकमेलर ही असली संदीप दूबे और जिसे स्वयं यहाँ पहचान का संकट पैदा हो गया।
चलो अब थोङा आगे के दृश्य का रसास्वादन करते हैं-
"प्यारे, ज्यादा मेरे दिमाग को मत झुलसा- मैं पहले से परेशान  हूँ- बस मुझसे ब्लैकमेल हो जा- तू जानता है कि तेरी पत्नी के खिलाफ मेरे पास क्या-क्या है?"
"उसकी कोई जरूरत नहीं वो मैने देख रखी है"
"क..कहां- तूने क्या देख ली भई?"
"अपनी बीवी के पास - उसके मोबाइल में है।"
संदीप के आगे पूरी दुनिया घूमने लगी। उसे चक्कर आने लगा।
"कैसा पति है यार तू?"- संदीप रो देने वाले स्वर  में बोला-" अपनी बीवी की रंगरलियां देख कर खुश होता है।"
देखा पाठक मित्रो ऐसा दृश्य कहीं। जहाँ स्वयं ब्लैकमेलर पनाह मांगता नजर आता है। क्या कोई पति अपनी पत्नी के अश्लील विडियो पर खुश हो सकता है। कभी भी नहीं, तो फिर यहाँ क्या चक्कर है?

संवाद-
उपन्यास में बहुत से ऐसे संवाद है जो पात्र का चरित्र-चित्रण करने के साथ-साथ उपन्यास को गति भी देते हैं। कई संवाद तो जीवन को सही दिशा देने वाले दर्शन सूत्र की तरह भी हैं।
- 'वफा, प्यार, मोहब्बत- ये सब फैंटेसी शब्द हैं, जो दिखने में तो खूबसूरत हैं लेकिन इनकी हकीकत कुछ भी नहीं है।"-(पृष्ठ-92)
- "नियति हमारे हाथ में नहीं है, बल्कि हम उसकी कठपुतलियां हैं - गिले शिकवे अपनी जगह और यथार्थ के कङवे घूंट अपनी जगह।"-(92-93)
- " मायके का तो कुत्ता भी प्यारा होता है।" (93)
- "जमाना कहीं नहीं पहुंचा- जमाना वहीं है, आज भी रोटी चावल खा रहा है- बस अय्याशी पर पहले प्रतिबंध था, अब वह ओपन हो गयी है। बीवी अपने पति की न होकर बाकी  सबकी है, बस यही चेंजिंग आई है जमाने में।"-(125)
- "दुनिया का कोई भी ऐसा मर्द नहीं है जो अपनी पत्नी के रूप में ईमानदार सीधी-सादी, नेक और चरित्रवान लङकी को न चाहता हो जबकि प्रेमिका के रूप में वह कैसी भी लङकी को पसंद कर लेगा।"-(143)
-" आशिक का मुकद्दर ऐसा होता है की वह करवटें बदलते-बदलते एक दिन गहरी नींद सो जाता है।"-(167)
-" जब दुश्मन के साथ दोस्त मिल जाये तब तबाही को रोक पाना मुश्किल है।"-(180)
-"एक औरत की क्या नियति है? जहां जायेगी छली जायेगी।"-(226)

जो मुझे अच्छा नहीं लगा-
पृष्ठ संख्या 89 पर सुरभि अजय को अपने पति विशाल के बारे में कहती है।
- "....मेरी जुल्फों की जंजीरों में जकङा गुलाम भला मेरे खिलाफ सोच सकता है"
वर्तमान में सुरभि एक पतिव्रता व अपने पति को सच्चा प्यार करने वाली स्त्री है। तब वह अपने पति संदर्भ में गुलाम या जुल्फों में जकङा आदि शब्द प्रयोग नहीं करेगी। इन शब्दों का अर्थ की वह अपने पति से सच्चा प्यार नहीं करती।
- पूरे उपन्यास में मात्र दो पंक्तियाँ है जो बस मुझे अच्छी नहीं लगी। क्योंकि उनकी वहाँ आवश्यकता नहीं थी।
पृष्ठ संख्या 151 की प्रथम दो पंक्तियाँ ।
- महाभारत की पात्र द्रोपदी को पांचाल क्षेत्र की होने के कारण पांचाली कहा जाता है। इस उपन्यास में लेखक सुरभि को किसी संदर्भ विशेष में पांचाली कहा है इसका कारण समझ में नहीं आता।
  उपन्यास पढें-
उपन्यास की भाषा शैली बहुत ही सरल है जो पाठक को तुरंत समझ में आती है। कहानी हमारे परिवेश की होने के कारण व संस्पैंश के कारण पाठक के मर्म को छू जाती है।
      युवावस्था में भटक कर की गयी गलतियाँ भविष्य में हमारे लिए किस प्रकार मुसीबतें खङी कर सकती हैं यह तो इस उपन्यास को पढ कर ही जाना जा सकता है।
  वर्तमान उपन्यास जगत के मार-काट, जासूसी और हिंसा प्रधान या फिर सामाजिक उपन्यासों के दौर में प्रस्तुत उपन्यास बिलकुल अलग है। क्योंकि उपन्यासकार ने जासूस को तो दिखाया है पर उसे कहीं भी हावी नहीं होने दिया यही स्थिति ब्लैकमेलर की है।
लेखक एम. इकराम फरीदी की कलम को नमन जिन्होने एक संग्रहनीय उपन्यास लिखा।

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उपन्यास- ट्रेजडी गर्ल
लेखक- एम. इकराम फरीदी
प्रकाशक- धीरज पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 240
मूल्य-80₹
सन्- may-2017
(उपन्यास प्राप्त करने के लिए लेखक से भी संपर्क किया जा सकता है)
एम.इकराम फरीदी
-Call/paytm- 9911341862
    - 8006756415
- moi mean fare edit gmail.com

Thursday, 11 May 2017

43. साजिश- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अनिल पंवार जब उस बरसाती और तूफानी रात को अपने घर पहुंचा तो उसकी बीवी घर से गायब थी। कब, कहां, किसके साथ चली गयी किसी को भी पता नहीं।
सब कहते रहे की वह अनिल पंवार को छोङ कर चली गयी, पर अनिल पंवार का मानना था की उसके साथ कोई हादसा हो गया, कोई साजिश हो गयी।
- तो कहां चली गयी अनिल पंवार की पत्नी?
-क्या वो एक साजिश थी?
-
साजिश सुरेन्द्र मोहन पाठक का एक अति तेज रफ्तार उपन्यास है। विमान की रफ्तार की तरह चलने वाला एक ऐसा कथानक है जिसे पाठक एक ही बैठक में पढना चाहेगा। उपन्यास में कसावट भी इतनी है के पाठक कहीं भी क्षणभर के लिए बोरियत महसूस नहीं करता।
       कहानी-
   अनिल पंवार एक केमिस्ट फार्मा में काम करने वाला नौजवान है। जिसकी आर्थिक स्थिति कोई ज्यादा अच्छी नहीं है।
   आठ माह पहले ही उसका विवाह हुआ है। अनिल पंवार की साली भी उनके साथ रहती है।
एक रात जब अनिल पंवार घर पहुंचा तो घर से उसकी पत्नी व साली दोनों गायब थी। बहुत इंतजार किया, बहुत ढूंढा पर वे दोनों न मिली।
    लोग उनके अतीत को देखते हुए कह रहे थे की दोनों अनिल पंवार को छोङ कर चली गयी। अनिल पंवार को इस बात पर विश्वास नहीं था। उसे लगता था उनके साथ साजिश हो गयी।
     अपनी पत्नी व साली के अतीत से अनजान अनिल पंवार उन्हें ढूंढने निकला तो उनके काले अतीत का एक भयावह सच सामने आ गया। जब अनिल पंवार ने इस काले सच को पार करना चाहा तो उसके रास्ते में कई लाशें बिछ गयी।
  - क्या अनिल पंवार की पत्नी व साली सच में गायब हो गयी थी?
- क्या उनके साथ साजिश रची गयी थी?
- क्या था उनके अतीत का सच?
- क्या अनिल उन्हें वापस पा सका?
ऐसे असंख्य प्रश्नों के उत्तर तो सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास साजिश को पढ कर ही मिल सकते हैं।
  विशेष- इस उपन्यास की कहानी व पात्र इस प्रकार आपस में मिले हुए हैं या एक ऐसा मिश्रण है की किसी भी पात्र का वर्णन करने का अर्थ होगा कहानी का रोमांच खत्म करना।
   एक तेज रफ्तार उपन्यास जो किसी भी पाठक को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है।
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उपन्यास- साजिश
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक