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Saturday, 30 December 2017

85. एक कैदी की करामात- अलेक्जेंडर ड्यूमा


एक ‌मासूम युवक की त्रासदी भरी कहानी।
बाल उपन्यास, रोचक- पठनीय
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एलेक्जेंडर डयूमा का यह बाल उपन्यास बहुत ही रोचक है। 
यह एक एडमंड दांते नामक युवक की कहानी है जो एक पानी के जहाज पर काम करता है। यह एडमंड दांते नामक युवक बहुत ही सीधा है और हर किसी पर विश्वास कर लेता है इसी विश्वास के परिणाम स्वरूप उसे उस जुर्म की सजा हो जाती है जिसका उसे पता तक नहीं होता। 
  एडमंड को राजद्रोही माना जाता है, उसके पास से एक खत मिलता है।
     एक सिपाही ने जहाज से एडमंड के कमरे से मिला कागज मेयर के हाथ में रख दिया।........कागज देखते- देखते मेयर के माथे पर पसीना आ गया। (पृष्ठ-17)
   एडमंड दांते का बाप, उसकी मंगेतर और उसके जहाज का मालिक उसका इंतजार करते हैं लेकिन शहर का मेयर उसे एक टापू पर स्थित जेल में बंद करवा देता है।
        समुद्र के अंदर एक टापू है और उसी टापू पर एक जेल है। एडमंड दांते को उसी जेल में कैद रखा जाता है।
     उस जेल में एडमंड को  एक ऐसा व्यक्ति मिलता है जो उसे अमीर बना देता है।

- एडमंड को जेल की सजा क्यों होती है?
- मेयर उस पत्र से क्यों घबरा जाता है?
- एडमंड जेल से बाहर कैसे निकला?
- एडमंड को जेल में मिला व्यक्ति कौन था?
- एडमंड अमीर कैसे बना?
- एडमंड ने अपने दुश्मनों से बदला कैसे लिया?
     जैसे एक नहीं अनेक प्रश्न है जो इस बाल उपन्यास को पढकर ही प्राप्त होंगे।

उपन्यास की कहानी बहुत रोचक है लेकिन इसका समापन बहुत जल्दी-जल्दी हो जाता है। आरम्भ में जहाँ कहानी विस्तार से लिखी गयी है वहीं अंत में आकर तो इसे बिलकुल संक्षिप्त कर दिया। अब पता नहीं यह कारनामा लेखक का है या अनुवादक का लेकिन कहानी का आनंद खत्म कर दिया।

     फिर भी इस बाल उपन्यास को पढा जा सकता है। पाठक को किसी भी स्तर पर निराशा का सामना नहीं करना पड़ेगा ।

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उपन्यास- एक कैदी की करामात
लेखक-    एलेक्जेंडर ड्यूमा
अनुवाद-  श्री कांत व्यास
प्रकाशक- शिक्षा भारती, मदरसा रोङ, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
प्रकाशन वर्ष- 2003©
पृष्ठ-80
मूल्य- 20₹


Monday, 25 December 2017

85. कारीगर- वेदप्रकाश शर्मा

एक अजब किरदार की गजब कहानी

कारीगर- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास, रोमांच, पठनीय।

वेदप्रकाश शर्मा सामान्य कहानी को एक विशेष अंदाज में कहने के लिए जाने जाते है।
  कहानी चाहे कितनी भी सहज और सामान्य हो लेकिन वेदप्रकाश शर्मा जी उसमें ऐसे घुमाव पैदा करते हैं की पाठक सोचता रह जाता है आगे क्या होगा।
   प्रभावशाली लेखक भी वही है जो पाठक को कहानी से जोङे रखे।  और इस विषय में वेदप्रकाश शर्मा जी अपने समकालीन उपन्यासकारों में अग्रणी रहें हैं।

   पाठक एक बार उपन्यास आरम्भ करता है तो फिर आगे सोचता रहता की कहानी में आगे क्या होगा। इस दृष्टि से कारीगर उपन्यास भी खरा उतरता है। संपूर्ण उपन्यास में पाठक पृष्ठ दर पृष्ठ यही सोचता रहता है की कहानी में आगे क्या होगा और जो आगे होता है वह पाठक की सोच से बहुत आगे का होता है। जहाँ पाठक को लगता है की यहाँ वही हुआ जो मैंने (पाठक) ने सोचा, ठीक उसके आगामी पृष्ठों पर पता चकता है की पाठक का दृष्टिकोण गलत था।
  अपनी इसी विशेषता के लिए वेदप्रकाश शर्मा जाने जाते हैं।

  प्रस्तुत उपन्यास कारीगर भी एक ऐसी ही घटना से आरम्भ होता है। फिल्म डायरेक्टर महेश घोष के कार्यालय में चक्रेश नामक युवक पिस्टल के दम पर जबरन घुस आता है और वहाँ बैठ महेश घोष व अन्य से जबरदस्ती रुपये, गहने आदि ले लेता है। सब डरे सहमें बैठे हैं लेकिन चक्रेश के सामने बोलने की किसी की हिम्मत नहीं। लेकिन अंत में चक्रेश बोलता -
     चक्रेश ने हाथ जोङे। चेहरे पर याचना के से भाव उभर आये। गिङगिङाया -" सर, स्ट्रगलर हूँ । मुंबई में नया-नया आया हूँ। एक्टिंग का शौक है। अपने टेलेंट का नमूना दिखाने का इससे बेहतर कोई और रास्ता नहीं सूझा। आपकी अगली फिल्म में काम मिल जाए तो....।
"हरामी के पिले! एक्टिंग कर रहा था तू! काम मांगने आया था यहाँ।"- घोष दहाङते चले गये। (पृष्ठ-14)
  एक दिन महेश घोष की बेटी की शादी में भी चक्रेश पहुँच गया और उसने ऐसा चक्कर चलाया की दरवाजे पर आयी बारात लौट गयी

  लेकिन फिर एक दिन चक्रेश महेश घोष के घर ही पहुंच गया।
" तो तू यहाँ ही पहुंच गया?"- महेश घोष के हलक से गुर्राहट निकली। " क्यों आए हो यहाँ? "
" सुना है, आप मेरी चमङी उधेङने के तलबगार हैं?"
" चक्रेश तेरा असली नाम नहीं हो सकता। सबसे पहले अपना असली नाम बता।"
उसके गुलाबी होंठों पर मुस्कान उभरी‌। बोला- " लोग चक्कर चलाने वाला ईश्वर ही कहते हैं मुझे।" (पृष्ठ -37)

- तो चक्रेश आज भी एक्टिंग कर रहा था?
- ऐसा क्या किया की महेश घोष की बेटी की बारात वापस लौट गयी?
- चक्रेश ऐसा क्यो कर रहा था?
- क्या चक्कर था चक्रेश की हरकतों के पीछे?
- कौन था चक्रेश?

यह सब तो उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है।

उपन्यास में कुछ रोचक दृश्य भी हैं-
"तुझसे ज्यादा जरूरत  मुझे है।"
"त..तुम्हें?"
"मेरी बीबी की शादी है।"
"ब..बीबी की शादी?
" जल्दी से बैग मेरे हवाले कर।....."
"म..मेरी समझ में नहीं रहा। तुम आखिर किस किस्म के।" (पृष्ठ -13)
   ऐसा ही एक और दृश्य है। वह है चांदनी की शादी के दिन आने वाले दो वकील अपलम- चपलम का।
" तू नहीं समझेगा। अनपढ है न। हम पढे लिखे हैं। वकील ठहरे।"
"तुम दोनों के नाम?"
"अपलम।"- लंबे ने कहा।
गुट्टा बोला -" चपलम" (पृष्ठ-16)
........
चपलम ने सिगार में  कस लगाने के साथ कहा- " हम उस शादी में आमन्त्रित किये जाने वाले सबसे पहले शख्स हैं।"
"अट्ठारह साल पहले ही आमंत्रित कर लिए गये थे।"- अपलम ने फिर पीक थूका -" इसलिए पधारे भी सबसे पहले हैं।" (पृष्ठ-17)
ये पात्र उपन्यास में जब भी आये उपन्यास को रोचक बनाते चले गये।

  उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर उपन्यास के बारे में कुछ लिखा गया है, आप भी पढ लीजिएगा।
      करीब इक्कीस साल पहले एक कत्ल हुआ।
मजे की बात - कत्ल होने वाले को मालूम था कि उसका कत्ल होने वाला है। इतना ही नहीं, उसे यह भी मालूम था कि कत्ल कौन करने वाला है। बावजूद इसके वह अपना कत्ल होने से रोक नहीं सकता था।
क्यों? यह है इस कहानी का पहला पेंच
दूसरा पेंच-  इक्कीस साल बाद एक बैंक का लाॅकर खुला। उससे ऐसे सबूत बरामद हुये जो अकाट्य रूप से उस शख्स को हत्यारा साबित करते थे जिसने कत्ल किया था।
    अगर आप जानना चाहते हैं कि कत्ल होने वाले ने इक्कीस साल बाद अपने कातिल को फांसी कराने का यब चमत्कार कैसे कर दिखाया तो हिंदी के सबसे ज्यादा बिकने वाले उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा के इस उपन्यास को जरूर पढें।

  उपन्यास का आरम्भ जितना रोचक है इसका समापन भी उतना ही रोचक है।  लेकिन उपन्यास का मध्यांतर बहुत ज्यादा निराश करता है। वहाँ ऐसा लगता है जैसे उपन्यास ठहर गया हो और वही पुरानी कथा कहानी की तरह एक नायक नाराज या नायक से नफरत करने वाली नायिका को मनाने के उपाय करता नजर आता है।

पृष्ठ संख्या 164 -165 पर पुलिस घायल गुण्डों के पास आती है पर उनकी मदद या हास्पिटल पहुंचाने की जगह चक्रेश का पीछा करने निकल जाती है।

    वेदप्रकाश शर्मा जी के स्वयं के प्रकाशन संस्था से प्रकाशित यह उपन्यास बहुत ही रोचक है जो पाठक को दिलचस्प भी लगता है।
  उपन्यास की कहानी पाठक की सोच से बहुत दूर निकल जाती है।
जो पाठक पढता है वह होता नहीं, जो दिखता है वह भी होता नहीं और जो उपन्यास में होता है वह पाठक सोच नहीं पाता।
कहा‌नी का अंत तो बार- बार चौंकाता है।
  उपन्यास रोचक है और पठनीय है।
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उपन्यास- कारीगर
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- तुलसी पेपर बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 286
मूल्य- 100₹

Thursday, 14 December 2017

84. ए टेरेरिस्ट- एम. इकराम फरीदी

ए टेरेरिस्ट- एम. इकराम फरीदी।
आतंकवाद की सत्यता बयान करता एक उपन्यास।
  ए टेरेरिस्ट, उपन्यास, जासूसी, पठनीय।
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  वर्तमान समय में जहां लोकप्रिय उपन्यास के पाठक व लेखक कम हुये हैं वहीं नये लेखकों का भी अभाव है और पाठकों का भी। और जो पुराने लेखक हैं वह भी उन परम्परागत विषयों/ कथा रूढियों पर ही कलम चला रहें हैं। ऐसे समय में इकराम फरीदी जी का उपन्यास ए टेरेरिस्ट सबसे अलग है।
  हालांकि आतंकवाद जैसे विषय पर कुछ लेखकों लिखा है पर वो सब एक्शन से आगे का नहीं लिखा गया। इकराम फरीदी जी ने जो लिखा है वह आतंकवाद के परिणाम की जगह आतंकवाद की उपज पर लिखा है।
   आखिर आतंकवादी क्यों बनते हैं, क्या कारण है। इस कारण की पङताल इस उपन्यास में इकराम फरीदी जी ने की है। जहां एक तरफ आतंकवाद के कारणों - परिणामों पर लिखा हैं वहीं उपन्यास में उन माँ- बाप व परिवार का भी चित्रण किया गया है जो अपने बच्चों को एक अच्छा नागरिक बनाना चाहते हैं लेकिन बच्चे गलत राह पर चल पङते हैं।
लेखक लिखता है, - एक भारतीय पिता,  जो अपने बेटे में तमाम भारतीय संस्कार भरना चाहता है। लेकिन बेटा जेहादी ताकतों के चंगुल में फंसकर आतंकवादी बन जाता है।

         उपन्यास की कहानी-
उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह एक छोटी सी कहानी है। कहानी जितनी छोटी है यह अपने अंदर उतने ही रहस्य समेटे हुए है। कहानी थ्रिलर होते हुए भी सामाजिक है और सामाजिक होते हुए भी थ्रिलर है। कहानी समाज के उस मुस्लिम वर्ग की बात करती है जिसे अधिकांश लोग आतंकवादी कहते हैं।
  उपन्यास में एक छोटा सा खुशहाल परिवार है शौकत अली का। परिवार में शौकत अली की पत्नी आमना, बेटी महविश और 18वर्ष का बेटा अहतर।
परिवार खुशहाल जीवन बीता रहा है। लेकिन बेटा एक तथाकथित धर्मगुरु के संपर्क में आता है और वह धर्मगुरु उसे धर्म की कट्टर शिक्षा प्रदान कर एक मासूम युवक से आतंकवाद बना देता है।
           
.            वह लोग कौन है जो मासूम‌ मन में धार्मिक कट्टरता का बीज बोते हैं। मुख्यतः यह उपन्यास उन्हीं लोगों पर निशाना है जो मासूम युवावर्ग को गुमराह करते हैं।
   इतनी तो इनके अंदर बुद्धि ही नहीं है- बस जन्नत और हूर में इनका दिमाग पङा है, इन्हें पीछे से सपोर्ट और पैसा मिल रहा है तो ये अपनी धर्मांधता और पुख्ता ईमान में डूबे हैं। (पृष्ठ-158)
     कोई भी धर्म, मजहब या जाति लङाई नहीं चाहती। उस लङाई के पीछे कुछ राजनैतिक सोच होती है और वह शातिर सोच शांति को भंग करती है। यही स्थिति भारत में है। भारत का आम नागरिक शांति पसंद है लेकिन कुछ बाहरी ताकतें भारत की शांति को भंग करना चाहती हैं।
  यानि आम मानस उस साजिश का शिकार पूरी तरह बन चुका है, विदेशी ताकतें जैसा विघटन हमारे समाज में पैदा करना चाहती हैं, हम विदेशी ताकतों के षडयंत्र में फंसकर वही करते चले जाते हैं, जो वो हमसे कराना चाहते हैं। (पृष्ठ-225)
 
   आतंकवाद को पैदा करने वाले कौन है?
   वह किसी भी धर्म और देश के हो सकते हैं।

संवाद-
     इकराम फरीदी के उपन्यासों की संवाद शैली बहुत अच्छी होती है, संवाद भी सुक्तिनुमा होते हैं। लेकिन प्रस्तुत उपन्यास में हालांकि संवाद कथा के अनुरूप अच्छे हैं लेकिन कहीं कोई सुक्तिनुमा बात नजर नहर आती।
फिर भी कहानी के अनुसार कोई भी संवाद कमतर नहीं है। उपन्यास के पात्र सामान्य परिवेश से हैं और उसी के अनुरूप संवाद भी हैं।
- कोई भी कौम जब अपनी संस्कृति से नफरत करने लगती है तो उसका बाहरी विचारधाराओं से उसका विरोध स्वत: ही खत्म हो जाता है। (पृष्ठ 100)
- हम आई एस आई वाले हैं, हमें भले यह न पता हो कि हमारे अपने देश में क्या हो रहा है.....मगर हिंदुस्तान पर हमारी पैनी नजर रहती है। (पृष्ठ-161)
- कोई पूछे की किस लिए लङ रहे हो तो इसलिए की हिंदू मूर्ति को पूजता है- अरे हराम के पिल्ले, कभी किसी हिंदू ने  तुझसे कहा है की तेरी नमाज पाप है। (पृष्ठ-177)
- आम मुस्लमान इस सबसे दूर है- वो निर्दोष है, वो मासूम है, लेकिन कुछ शातिर ताकते जब किसी समाज में विघटन पैदा करना चाहती हैं ...तो उस शातिर ताकत के लिए मौलाना सबसे सस्ते में उपलब्ध हैं।(पृष्ठ-181)

 
उपन्यास में कमी
      लेखक ने प्रस्तुत उपन्यास में स्वर्गीय वेदप्रकाश शर्मा के प्रसिद्ध पात्र विजय- विकास को लेकर लिखा है लेकिन लेखक विजय- विकास को उस रूप में प्रस्तुत करने में पूर्णतः विफल रहा है जिस रूप में वेदप्रकाश शर्मा जी विजय-विकास सीरिज लिखते हैं।
     उपन्यास थ्रिलर है लेकिन उपन्यास में कहीं कोई टविस्ट नहीं है। कहानी किसी भी स्तर पर पाठक को निराश नहीं करती लेकिन पाठक को कहीं चौंकाती भी नहीं है।

निष्कर्ष-
  उपन्यास का जो विषय है वह वर्तमान की एक विशेष समस्या पर है। लेखक का यह सराहनीय प्रयास की उन्होंने एक ऐसे विषय को चुना है जिस पर लेखक लिखने से बचना चाहते हैं‌ लेखक का यह प्रयास सफल भी रहा है।
  प्रस्तुत उपन्यास पठनीय है जो पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा अपितु पाठक को एक सच्चाई से मिलवायेगा।
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उपन्यास- ए टेरेरिस्ट
ISBN - 81-7789-514-1
लेखक - एम. इकराम फरीदी
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 247.
मूल्य- 80₹
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विशेष-
प्रस्तुत उपन्यास में लेखक के पूर्व उपन्यास गुलाबी अपराध का क्लाइमैक्स भी दिया गया है,
और गुलाबी अपराध उपन्यास की प्रतियोगिता के विजेता राममेहर सिंह (जींद, हरियाणा) का लेखक को‌ पत्र भी प्रकाशित है।








Wednesday, 6 December 2017

83. जनकवि रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

एक जनता का कवि- विद्रोही
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जनकवि रमाशंकर यादव मेरे प्रिय कवि हैं।

विद्रोही जी की कविताएं और जीवन परिचय यहाँ उपलब्ध है।
यहाँ क्लिक करें-

https://drive.google.com/file/d/1UaIrTXFljeG9dwWOchWJetXjyO6D2PKo/view?usp=sharing

Friday, 17 November 2017

82. मेरी जीवन यात्रा- अब्दुल कलाम

कलाम की कहानी, उन्ही की जुबानी।

मेरी जीवन यात्रा, आत्मकथा, पठनीय।
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  एक साधारण परिवार के सामान्य से बच्चे से वैज्ञानिक और वैज्ञानिक से राष्ट्रपति बनने  का सफर वास्तव में पढने योग्य है। कलाम की आत्मकथा उनके कई अच्छे-बुरे संघर्षों का चित्रण करती है जो कि पाठक को आगे बढने की प्रेरणा भी देती है।

कलाम लिखते हैं- " मेरे जीवन की यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण अनुभव है, जिन्हें मैंने अपने बचपन से अब तक सँजोया है और अपने जीवन के 80 से अधिक वर्षों में प्राप्त किया है।"
                 इस पुस्तक में क्या है, -" मेरी अन्य पुस्तकों की तरह ' मेरी जीवन यात्रा' में मुख्य केन्द्र कुछ छोटी तथा अनजान सी घटनाएं थी, जो मेरे जीवन में घटित हुयी। अपने माता- पिता से जुङी अनेक घटनाओं की व्याख्या मैंने इस पुस्तक में की है।"
         संपूर्ण किताब को छोटे- छोटे 12 खण्डों में विभक्त किया है, यह किताब की रोचकता भी है। इस आत्मकथा में अधिकतर घटनाएं कलाम जी के बचपन और उनके परिवार का चित्रण करती नजर आती है। 
   कलाम जी के जीवन में अनेक अवरोधक पैदा हुए लेकिन कलाम जी ने कभी हार नहीं स्वीकार की।

जहाँ आजकल शिक्षित वर्ग ईश्वर के अस्तित्व का पूर्णत नकार देते हैं वहीं कलाम उस अदृश्य सत्ता से प्रभावित होकर लिखते हैं, - " हम सबके जीवन में दिव्य शक्ति विद्यमान है, जो हमें नकारात्मक क्षणों में तथा दुःख के पलों से उबरने की शक्ति देती है।" (पृष्ठ-21)
   आठ बरस का कमाऊ लङका नामक खण्ड में कलाम साहब के बचपन के संघर्ष का वर्णन है। मात्र आठ वर्ष की उम्र में कलाम साहब सुबह उठकर घर-घर
अखबार पहुंचाते थे और ट्युशन और विद्यालय भी जाते थे।
छोटी सी उम्र में कठिन मेहनत और उस पर भी कभी उनके चेहरे पर कभी निराशा नहीं झलकी।
     अपने शहर के प्रेम- साम्प्रदायिक सौहार्दपूर्ण वातावरण का चित्रण संकट मोचक तीन व्यक्ति नामक खण्ड में करते हैं।
         शहर के तीन नामी व्यक्ति और वह भी तीनों अलग- अलग धर्म से संबंधित थे पर शहर के अमन-चैन उन तीनों के लिए प्राथमिक था। और सच्चा धर्म भी वही है जो मनुष्य को सच्ची शांति प्रदान करे। इस वातावरण का कलाम के जीवन पर गहरा असर रहा
" अगर मेरे धर्म की बात की जाये तो निश्चित रूप से मेरे भाग्य ने मुझे विज्ञान और तकनीक क्षेत्र में पहुंचाया था, उसकी बुनियाद रामेश्वरम् से बनी थी। मैं हमेशा से ही विज्ञान में विश्वास करने वाला था, लेकिन इसके साथ ही मेरा आध्यात्मिक विश्वास था, जो कि युवावस्था में हि स्थापित हो चुका था।........मुझे ज्ञान की प्राप्ति कुरान, गीता तथा बाइबिल से मिली। इनके मिलाप से ही मेरे जीवन व संस्कारों का मिलाप मुझे अपनी जन्मभूमि से मिला था  और इस शहर के अनूठे संस्कारों ने मेरा पूर्ण विकास किया। (पृष्ठ 53)
     यह पुस्तक जो की कलाम जी के परिवार का मुख्यतः परिचय देती है। इसमें इनके परिवार को जानने- समझने का काफी अच्छा अवसर मिलता है। इसी पुस्तक का एक खण्ड है मेरी माँ और मेरी बहन
  इस खण्ड का आरम्भ इन पक्तियों से होता है
" सागर की लहरें, सुनहरी रेत, यात्रियों की आस्था,
   रामेश्वरम् की मस्जिद वाली गली, सब आपस में मिलकर एक हो जाती हैं,
वह है मेरी माँ।"
  द्वितीय विश्व युद्ध के उन कठिन दिनों का वर्णन भी मिलता है जब पूरे परिवार को राशन तय कोटे के अनुसार ही मिलता था लेकिन कलाम जी की ममतामयी माँ स्वयं भूखी रहकर अपने बच्चों को भरपेट खाना खिलाती थी।
और वहीं बहन जौहरा का वर्णन भी है जिसने कलाम जी की शिक्षा के लिए अपने आभूषण तक बेच दिये।
       कलाम जी का पुस्तक प्रेम तो सर्वविदित है, उन्होने जितना अच्छा पढा है उतना अच्छा लिखा भी है। 
" ...पुस्तकों से मेरा घनिष्ठ संबंध रहा है। वे मेरे अच्छे मित्रों की तरह है।"(पृष्ठ -87)
इस खण्ड में कलाम जी ने अपनी प्रिय पुस्तकों का भी जिक्र किया है।

प्रेरणादायक कथन-
- हमारे अंदर का दृढ विश्वास तथा हमारे अंदर के विचार है, जो हमारे कार्यों को प्रभावित करते हैं।
- मेरा मानना है की एक ही सत्ता (ईश्वर) है जो हर किसी सुनती है।(पृष्ठ 70)
- जो शिक्षक अपने विद्यार्थी की प्रगति का ध्यान रखता है, वही हमारा सर्वश्रेष्ठ मित्र होता है। (पृष्ठ-82)
- निराशा के भाव समाप्त होने के बाद इंसान की सोच में बदलाव आता है और उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आता है। (पृष्ठ 99)
- हम सिर्फ राजनीतिक घटनाओं को ही देश-निर्माण समझते हैं, परंतु बलिदान, परिश्रम तथा निर्भयता ही सही अर्थों में देश बनाती है। (पृष्ठ-106)
- विज्ञान एक आनंद और जुनून है।
         डाॅ. अब्दुल कलाम जी ने स्वयं के बारे में बहुत सुंदर शब्दों में बहुत ही अच्छी बात कही है, - कठिन परिश्रम, अध्ययन करना सीखना, सद्भाव तथा क्षमा कर देना- ये सब मेरी जिंदगी में मील के पत्थर हैं।
     पुस्तक में कई जगह करुण प्रसंग भी हैं जो कलाम जी को ताउम्र याद रहे और किसी भी पाठक को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

अगर किसी भी पाठक को कलाम जी के जीवन को समझना है तो यह पुस्तक उनके परिवार और बचपन का अच्छा चित्रण करती है।
इस पुस्तक का अधिकांश चित्रण इनके परिवार से ही संबंधित है और कुछ अंश इनके वैज्ञानिक जीवन से  भी हैं लेकिन‌ पुस्तक में कलाम जी के राष्ट्रपति कार्यकाल का नाम मात्र वर्णन ही मिलता है।
पुस्तक भी भाषा शैली बहुत ही सरल और सरस है जो किसी भी पाठक को सहज ही समझ में आ जाती है। कहीं भी भारी भरकम या तकनीकी शब्दावली का प्रयोग नहीं किया गया।
हालांकि यह पुस्तक मूलतः अंग्रेजी में थी और यह इसका हिंदी अनुवाद है।
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पुस्तक-  मेरी जीवन यात्रा
ISBN -978-93-5048-797-6
लेखक - ए.पी. जे. अब्दुल कलाम आजाद
( 15.10.1931- 27.07.2015)
मूल पुस्तक- My journey
अनुवादक- महेन्द्र यादव
प्रकाशन- प्रभात पेपरबैक्स
www.prabhatbooks.com
संस्करण- 2017
पृष्ठ- 143
मूल्य- 150₹

Wednesday, 15 November 2017

80. नीला स्कार्फ- अनु सिंह चौधरी

नीला स्कार्फ, अनु सिंह चौधरी, कहानी संग्रह
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अनु सिंह चौधरी के इस कहानी संग्रह में छोटी-बङी कुल बारह कहानियाँ हैं। सभी कहानियाँ परिवेश, कथ्य और संवेदना के स्तर पर अलग -अलग हैं।
    आपको इनकी कहानियों में गांव भी मिलेगा तो शहर भी मिलेगा, आधुनिकता भी है तो प्राचीन संस्कार भी है, लव इन रिलेशनशिप भी है तो परम्परागत रिश्ते भी हैं।
  हम समग्र रूप से कह सकते हैं की नीला स्कार्फ विविध रंगों का एक गुलदस्ता है।
         इस संग्रह की प्रथम कहानी रूममेंट जहां प्रारंभ में मुझे नीरस सी लगी लेकिन इस कहानी का अंत आंखों में नमी दे गया। और ऐसी ही एक और कहानी है सिगरेट का आखिरी कस
   बिसेसर बो की प्रेमिका एक ग्रामीण परिवेश की वह कहानी है जो पुरुष प्रधान वातावरण को चित्रित करती है। इस के लिए बिसेसर बो का एक कथन ही काफी है, -"मरद जात के गरदन में चाहे जो लटकता रहे, दुनियां को औरत के गले में लटकता हुआ मंगलसूत्तर ही अच्छा लगता है।" (पृष्ठ-44)
      फिल्म दुनिया के सुनहरे पर्दे के पीछे छुपे काले सच को बयान करती है कहानी प्लीज डू नाॅट डिस्टर्ब।
इस संग्रह की कुछ अलग हटकर कहानी है वह है कुछ यूँ होना उसका।
   शिक्षक जीवन में ऐसे कई प्रसंग देखने को मिलते हैं जैसा की इस कहानी में व्यक्त किया गया है। और यह कहानी भी इस संग्रह की वह कहानी है जो सरल शब्दावली में है। न तो इसमें आंचलिक शब्द हैं और न ही अंग्रेजी के।
इस संग्रह की मुख्य कहानी है नीला स्कार्फ। यह वर्तमान हमारी जीवन शैली पर गहरा व्यंग्य है। हम आधुनिकता की दौङ में अप‌ने परिवार तक को भी भूल गये।
  यह एक अच्छी कहानी है लेकिन इस प्रकार की बहुत सी कहानियाँ लघुकथाओं में पढी जा चुकी हैं। कहानी के प्रस्तुतिकरण में कोई नयापन नहीं था। और ऐसी ही कहानी है सहयात्री। जिसे लगभग पाठक पढ चुके होंगे।
हाथ की लकीरें और मर्ज जिंदगी इलाज जिंदगी कहानियाँ कोई विशेष प्रभाव नहीं छोङ पायी।
    ‌प्रस्तुत कहानी संग्रह अच्छा कहानी संग्रह है जिसकी कहानियाँ बहुत रोचक व मन को छू लेने वाली है।

कुछ विशेष संवाद-

मंदिर की सीढियां चढते मन पापी हो सकता है..।(पृष्ठ-35)
- शहर अनजान और अपना नहीं होता। हम उसे अपना या बेगाना बना देते हैं। (पृष्ठ-52)
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पुस्तक- नीला स्कार्फ (कहानी संग्रह)
ISBN: 978-93-81394-85-4
लेखिका- अनु सिंह चौधरी
प्रकाशक- हिंद युग्म
पृष्ठ-160.
मूल्य- 120₹
प्रथम संस्करण- जुलाई 2014
तृतीय संस्करण- सितंबर 2015
लेखिका संपर्क-
www.mainghumantu.blogspot.com
Email- anu2711@gmail.com
 

79. ब्राउन शुगर- रवि माथुर

भारत से अफ्रीका के कबीले तक फैली हरी मौत का रहस्य
ब्राउन शुगर, रोचक उपन्यास, मध्यम स्तर।
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होटल इंटरनेशनल काॅन्टीनेन्टल
31 दिसंबर की रात
नववर्ष के शुभारंभ की पार्टी चल रही थी और जिसमें एक नीग्रो युवती मिस टोटो नृत्य कर रही थी। इस दौरान किसी ने मिस टोटो की स्टेज पर हत्या कर दी।
इसी वक्त वहाँ उपस्थित कैप्टन हमीद ने इस मामले में हस्तक्षेप किया।
   कैप्टन हमीन और कर्नल विनोद इस केस की जांच पर आगे बढे तो पता चला की कुछ दिन पूर्व एक नीग्रो युवक की लाश शहर में मिली थी और उसका शरीर हरा था।
   मिश्र घूमने गये मिस्टर कोरक और नानसी के सामने वहाँ एक हत्या हो गयी और मृतक का शरीर हरा हो गया।
"कौन थे वे लोग? तुम्हें किसने मारा?"
"हरी मौत।"
     भारत की धरती पर ब्रिटेन, मिश्र के लोगों में उपजी एक अनोखी जंग जिसमें भारत के जासूस कर्नल विनोद और हमीद को भी शामिल होना पङा और जिसका अंत अफ्रीका के कांगो बेसिन के एक टापू पर हुआ।
  विभिन्न देशों में घूमती हुयी एक खतरनाक कहानी।
उपन्यास के पात्र-
कर्नल विनोद- भारत का प्रसिद्ध जासूस।
कैप्टन हमीद- भारतीय जासूस।
कोरक- भारतीय जासूस। जो इस प्रकरण के दौरान मिश्र में था।
नानसी- कोरक की साथी।
कासिम- उपन्यास का एक हास्य पात्र‌।
डेविस- एक खतरनाक अपराधी।
रोजर- माटू देवता की आँख चुराने वाला व्यक्ति।
हारूण- मिश्र पुलिस का अधिकारी।
आयशा- रोजर की साथी।
प्रिंस लुआगा- मारोगाटो कबीले के सरदार का पुत्र ।
माटू देवता- कबीले का देवता।

शीर्षक-
जैसा की उपन्यास का शीर्षक ब्राउन शुगर है तो स्वाभाविक है पाठक का ध्यान नशे की तरह ही जायेगा।
उपन्यास के प्रारंभिक पृष्ठ भी कुछ ऐसा ही लिखा है।
" ब्राउन शुगर...एक ऐसा खतरनाक नशा जो युवा पीढी को को मौत के समुद्र में धकेल रहा था।"
  हालांकि उपन्यास का उपर्युक्त पंक्तियों या शीर्षक से किसी भी प्रकार का कोई भी सबंध स्थापित नहीं होता।
अब पता नहीं लेखक/ प्रकाशक ने यह नाम कैस रख दिया।

गलतियाँ-
उपन्यास में कई जगह गलतियाँ है।
- होटल काॅन्टिनेटल में मिस टोटो का हत्यारा स्टेज पर टोटो की हत्या पहले करता है और उसके कमरे की तलाशी बाद में लेता है।
जबकी होता इसका विपरीत। अगर हत्यारा कमरे की तलाशी पहले लेता तो उसे मिस टोटो की हत्या करने की जरूरत भी न पङती और हत्या के बाद तलाशी लेने का वक्त कहां से मिल गया।

- पृष्ठ 97-100 में
होटल में कोरक और नानसी के सब्जी के बर्तन में दोनों को मारने के लिए जिंदा सांप डाल दिया जाता है।
कमाल है सब्जी में सांप और वह भी जिंदा।

 - कासिम उपन्यास का एक हास्य पात्र है। अफ्रीका के दौरे पर उसे साथ लेकर जाने का कोई औचित्य भी नहीं था।

समापन:-
  किसी भी कहानी का क्लाइमैक्स (समापन) उसका चरम बिंदु कहलाता है। पाठक की पूरी उत्सुकता होती है की अंत में क्या हुआ।
  इस उपन्यास के अंत तक पाठक भी यही सोचता है की अंत में क्या हुआ, क्या सारा खेल ब्राउन शुगर का है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था।
लेखक उपन्यास का समापन इतने अच्छे तरीके से न कर सका जितने की उम्मीद थी।

      रवि माथुर का प्रस्तुत उपन्यास एक मध्यम स्तर का उपन्यास है जो कई जगह अपनी कहानी से भटकता है लेकिन अंत में क्लाइमैक्स तक पहुंचता है।
  यह एक मध्यम स्तरीय उपन्यास है जिसे पाठक समय बिताने के लिए पढ सकता है।

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उपन्यास- ब्राउन शुगर
लेखक- रवि माथुर।
प्रकाशक- दुर्गा पॉकेट बुक्स, 315, ईश्वर पुरी, मेरठ- 250002
पृष्ठ- 207
मूल्य- 20₹

लेखक संपर्क-.
रवि माथुर
428/ 15 B
ईश्वर पुरी, मेरठ- 250002